Tuesday, October 19, 2010

****फ़ितरत**** 

अब नहीं कुछ उससे लेना-देना, 
हर कर्ज़ अदा कर चुके हैं हम 

अब बचने की सूरत ही नहीं, 
कातिल को रकम अदा कर चुके हैं हम   

अब कुछ नहीं पास बचा हमारे, 
सब निसार रहे वफ़ा कर चुके हैं हम 

अब किस की राह तके बता दो, 
हर शख्स को खफ़ा कर चुके हैं हम   

अब न होगी हमसे दोबारा यारों, 
एक बार जो खता कर चुके हैं हम 

अब उसको इल्जाम क्या देना, 
उसकी फ़ितरत का पता कर चुके हैं हम   

अब हो जायेगा जो होना है, 
हर बात का उससे गिला कर चुके हैं हम 

अब क्या उम्मीद करें , 
चाहत का खतम सिलसिला कर चुके हैं हम   

अब कुछ हासिल न होगा, 
यही सोचकर राह जुदा कर चुके हैं हम 

अब नहीं कोई वास्ता, 
इस दुनिया से खुद को गुमशुदा कर चुके हैं हम    

पूजा तोमर 

Friday, October 15, 2010


****मरहम**** 

तुम अपनी वफ़ा की नही, हम पर किये सितम की
बात करो

जो दिल मे निशां 
छोड गये उन कदम की 
बात करो

जिसने हमको तुमसे दूर किया जरा उस नये सनम की
बात करो

मेरे जख्मो की गहराई तो देखो फिर किसी मरहम की
बात करो

एक वही मतलब निकलता है, तुम करम या सितम 
की बात करो

पूजा तोमर 

Monday, October 11, 2010

****अग्नि -परीक्षा****

अब बसने दे मेरा घर बहुत दिल जलाकर 
देख लिया

अब मिलाने दे नजरो से नजरे बहुत नजरे चुराकर 
देख लिया


जो न देखा हमने सनम तुझसे दिल लगाकर 
देख लिया 

क्या होता है सच्चा प्यार तूझे अपना बनाकर 
देख लिया 

अब मुझे देने दे अग्नि -परीक्षा तुझे तो आजमाकर
देख लिया 

पूजा तोमर 

****भूले नही ****

यूं तो हमने वो शहर छोड दिया है 
पर आज भी उसका मका भूले नही 

कितने गुजरे हैँ इन राहोँ से अब तक
हम लेकिन उसके नक्शे-पा भूले नही 

जिसने खुद से ही अनजाना कर दिया   
उसकी वो कातिलाना अदा भूले नही 

अरे सुन ले ओ जाती हवा कह देना उसे 
तुझको हम आज भी ओ बेवफ़ा भूले नही 

उसको नही याद मेरा नाम तलक 
और एक हम है कि उसका पता भूले नही 

जिस वजह् से उसने रुसवा किया हमको 
आज भी करना हम वो खता भूले नही

पूजा तोमर 

Sunday, October 10, 2010

****मजहब****

क्या कहूं अपने मजहब की मेरा मजहब तो 
इन्सानियत है 

इसमे दुश्मन को भी दोस्त बनाने की 
काबिलियत है 

इसमे बडो जैसी समझदारी और बच्चो सी 
मसूमियत है 

इसको हर किसी मे इन्सान नज़र आता है यही इसकी 
खासियत है 

पूजा तोमर 

Tuesday, October 5, 2010

****बारिश**** 

हम हसीयत अपनी जमाने मे बढना चाहे 
एक मुसाफ़िर तेरे कदमो मे ठीकाना चाहे 

बात भूली सी तेरे दिल को याद दिलाना चाहे 
बिना बात के रुठे हुए हमदम को मनाना चाहे 

जो अनकही सी बाते है दिल आज बताना चाहे 
गुमनाम सी गलियो मे दिल फिर जाना चाहे 

 दिल अपनी कहानी किसी कदरदान को सुनना चाहे 
"पूजा" भी इस जहां मे एक खास जगह बनाना चाहे 

आज फिर होने लगी है गुजरे दिनो कि बारिश 
फिर से आज दिल मेरा सडको पे नहाना चाहे 

पूजा तोमर